दो तीन दिन से सोच रहा हु कुछ लिखू पर क्या लिखूं किसके लिए लिखूं? लेकिन रहा नही गया बिना लिखें।। सोसल मीडिया पे हाहाकार मचा हुआ है दो दिन से । सब अपने अपने मन से बातें बना रहे है एक दूसरे को बता रहे है आज ऐसा हो गया उसके घर में ऐसा हो गया। अरे किसके घर में हुआ? क्यों हुआ? कैसे हुआ? तरह तरह की बातें हो रही है।।।
अगर कोई लड़का लड़की अपने रास्ते से भटक जाए कोई गलत कदम उठा ले तो हम सब यह सब होने के बाद ही बात क्यों करते है? जानते सब है कि कुछ गलत हो रहा है जानते हुवे भी अनजान क्यों बन जाते है। किसीको सही रास्ता क्यों नही दिखाते? आखिर कब तक इस तरह का मजाक बनाते रहेंगे एक दूसरे का? आखिर ऐसा क्यों होता है इस तरह की घटना क्यों घट जाती है इसे कैसे रोका जाए इस पर कोई नही सोचता !
कहने को तो परिवार बहुत बड़ा है पर भाई को भाई नीचे दिखाने में लगा हुआ है किसी के घर में अच्छा हो रहा है ईर्ष्या होने लगती है। किसी के घर में बुरा हो रहा है तो अंधे बन जाते है मुझे क्या करना यह तो उसके घर का मामला है।।
घर किसका है? कौनसे परिवार का है? किस समाज का है? और कौनसे गाँव का है? घूम फिर के बात गाँव पे आ जाती है। सबसे पहले गाँव का जिक्र होता है फलाने गाँव में फलानी घटना हुई।। नाम पुरे गाँव का आता है पूरा गाँव एक परिवार है पर ऐसे परिवार का ऐसे समाज का ऐसे गाँव का क्या करे जहाँ एकता ही नही है।
अगर कोई नादानी में गलत कदम उठा लिया तो उसका तमाशा बनाने के बजाय आगे ऐसा कोई कदम ना उठाये ऐसा हम क्यों नही सोचते? हम क्यों अपने आपको अँधेरे में रखते है?
घर की लक्ष्मी बेटी को बहु को कहते है जब ये बेटियां ये बहुएं ही ना समझे तो इसमें घर वालो का क्या दोष है? घरवाले क्यों शर्मिन्दगी महसूस करे? रही बात इज्जत की तो कोई एक घर की बात नही है यह पूरे गाँव की इज्जत की बात है क्योंकि सबसे पहले गाँव का ही नाम आता है फिर समाज का और फिर उस घर का।।
सौ बात की एक बात जैसा माहौल आज बन रहा है गाँव का इसमें दौष उन लड़के लड़कियों का नही है ये दौष हम सब का है हम सबने ही आज चारो तरफ छूट दे रखी है अपने बच्चो को। कभी उन्हें ये नही बताया क्या सही है और क्या गलत । कभी उन पर कोई पाबंधी नही लगाई कभी उनको वो संस्कार नही दिए जो बहुत जरुरी है। बस बेटी ने मोबाइल माँगा ला के दे दिया पर यह नही देखा की वो उसका इस्तेमाल कैसे कर रही है स्कूल भेज दिया पर यह नही देखा कभी वो पढाई कैसे कर रही है । आज नतीजा सामने है दौष किसका है ।।
जरुरत है सुधार की ।
जरुरत है संस्कार की ।
जरुरत है नींद से जागने की।
जरुरत है एक बदलाव की।।
अगर मेरी बात से किसीको कोई तकलीफ हो तो माफ़ी चाहता हूँ पर हक़ीक़त यही है आज की।। हम जीने अध्यक्ष बनाते है उन्हें भी आगे आ करे इस पर पुरे जोर से चर्चा करानी चाहिए रोज की घटना होने वालीं है इसी बात को सब को आगे आ कर बातचीत करनी चाहिए हाँथ जोड़ कर विनती है हर समाज के नागरिक का कर्तव्य बनता है यह नहीं की हमारा क्या फलाना समाज है पर यह मत भुलो की कल आप के साथ भी हो सकता है


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