गुरुवार, 29 जून 2017

शून्य ही पाया।।

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शून्य ही पाया

आदमियों की बस्ती में , जुल्म इतना बढ़ा
के होती है रोज ,शहीद , इंसानियत यहाँ

किसको सुनाऊं हाल ए दर्द , आज अपना
हर रोज तो कत्ल होता है , सुखो का यहाँ

लछमन रेखा है , गम और खुशी के बीच
सांसों के कटोरे , ले जाऊँ मैं आज कहाँ

कत्ल कर दो, तमन्नाओं का ,अब तो यहाँ
जमाना बहुत खराब है होगी पूरती ना यहाँ

आशा निराशा के दामन , भीगे ,निचोड़ लो
मैला सा कतरा लहु , मिलेगा फिर यहाँ

सांसों की बंद गिनती में इस जहां का बन्दा हुँ
कोई ये मुझे बता दे , कि मैं आज जिन्दा हुँ

चन्द सांसों का हिसाब , सारी उम्र लगाया
पाई पाई जोड़ा , अंत में , शून्य ही पाया

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Author: verified_user