शून्य ही पाया
आदमियों की बस्ती में , जुल्म इतना बढ़ा
के होती है रोज ,शहीद , इंसानियत यहाँ
किसको सुनाऊं हाल ए दर्द , आज अपना
हर रोज तो कत्ल होता है , सुखो का यहाँ
लछमन रेखा है , गम और खुशी के बीच
सांसों के कटोरे , ले जाऊँ मैं आज कहाँ
कत्ल कर दो, तमन्नाओं का ,अब तो यहाँ
जमाना बहुत खराब है होगी पूरती ना यहाँ
आशा निराशा के दामन , भीगे ,निचोड़ लो
मैला सा कतरा लहु , मिलेगा फिर यहाँ
सांसों की बंद गिनती में इस जहां का बन्दा हुँ
कोई ये मुझे बता दे , कि मैं आज जिन्दा हुँ
चन्द सांसों का हिसाब , सारी उम्र लगाया
पाई पाई जोड़ा , अंत में , शून्य ही पाया


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